परंपरागत कृषि विकास योजना

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द्वारा प्रस्तुत Minakshi on Fri, 30/10/2026 - 14:51
Narendra Modi PM of India
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परंपरागत कृषि विकास योजना
हाइलाइट
  • परंपरागत कृषि विकास योजना की शुरुआत वर्ष 2015-16 में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए की गई थी।
  • इस योजना के तहत पात्र किसानों को 3 साल में प्रति हेक्टेयर ₹31,500 की आर्थिक सहायता दी जाती है।
  • जैविक खेती की सामग्री खरीदने या तैयार करने के लिए ₹15,000 DBT के माध्यम से सीधे किसानों के बैंक खाते में भेजे जाते हैं।
  • इस योजना में समूह बनाकर जैविक खेती करने को बढ़ावा दिया जाता है और छोटे तथा सीमांत किसानों को प्राथमिकता दी जाती है।
ग्राहक देखभाल फ़ोन नंबर
  • कृषि एवं किसान कल्याण विभाग, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार
    • फोन नंबर: 011-23385093 (विभाग का सामान्य संपर्क नंबर)
  • राष्ट्रीय जैविक एवं प्राकृतिक खेती केंद्र (NCONF)
योजना का अवलोकन
योजना का नामपरंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY)
शुरुआत का वर्ष2015–16
लाभ3 साल में प्रति हेक्टेयर ₹31,500 तक की आर्थिक सहायता दी जाती है। इसमें जैविक खेती के लिए ₹15,000 की राशि DBT के माध्यम से दी जाती है।
लाभार्थीजैविक खेती अपनाने वाले किसान। इसमें छोटे और सीमांत किसानों को प्राथमिकता दी जाती है।
नोडल एजेंसीकृषि एवं किसान कल्याण विभाग, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय
सब्सक्रिप्शनयोजना से जुड़ी जानकारी और अपडेट पाने के लिए यहां सदस्यता लें
आवेदन का तरीकाराज्य के कृषि विभाग और क्षेत्रीय परिषदों के माध्यम से ऑफलाइन आवेदन किया जा सकता है। PGS समूह का रजिस्ट्रेशन ऑनलाइन भी किया जा सकता है।

योजना के बारे में

आज के समय में जैविक खेती का महत्व लगातार बढ़ रहा है। किसान खेती का खर्च कम करने, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और सुरक्षित कृषि उत्पाद तैयार करने के लिए जैविक खेती की ओर बढ़ रहे हैं। किसानों को खेती के इस तरीके को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने वर्ष 2015-16 में परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) की शुरुआत की थी। इस योजना के तहत किसानों को समूह यानी क्लस्टर बनाकर जैविक खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। साथ ही, पात्र किसानों को 3 साल में प्रति हेक्टेयर ₹31,500 की आर्थिक सहायता दी जाती है। इस राशि में से ₹15,000 सीधे किसानों के बैंक खाते में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के माध्यम से भेजे जाते हैं, ताकि वे जैविक खेती के लिए जरूरी सामग्री खरीद सकें या खुद तैयार कर सकें। इसके अलावा, योजना के तहत जैविक प्रमाणन, किसानों की ट्रेनिंग, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाने और उनकी बिक्री में भी सहायता दी जाती है।

शुरुआत में इस योजना को राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA) के तहत मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन कार्यक्रम के एक हिस्से के रूप में शुरू किया गया था। अक्टूबर 2024 में कृषि योजनाओं में बदलाव के बाद PKVY अब प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (PM-RKVY) के नौ घटकों में से एक है। इस योजना को भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत आने वाला कृषि एवं किसान कल्याण विभाग राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों के माध्यम से लागू करता है।

परंपरागत कृषि विकास योजना का मुख्य उद्देश्य किसानों को स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों, जैविक खाद, जैव उर्वरकों और अन्य प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल करके जैविक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है। इस योजना का मकसद रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर किसानों की निर्भरता कम करना, मिट्टी की सेहत सुधारना, प्राकृतिक संसाधनों को बचाना और पर्यावरण के अनुकूल खेती को बढ़ावा देना है। इसके साथ ही, किसानों को समूह बनाकर खेती करने, एक-दूसरे के साथ संसाधन और जानकारी साझा करने, तकनीकी ट्रेनिंग लेने और अपनी उपज के लिए बेहतर बाजार ढूंढने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता है।

PKVY के तहत 3 साल में प्रति हेक्टेयर ₹31,500 की आर्थिक सहायता दी जाती है। इसमें जैविक खेती के लिए खेत के अंदर और बाहर इस्तेमाल होने वाली सामग्री खरीदने पर DBT के माध्यम से ₹15,000, ट्रेनिंग और क्षमता बढ़ाने के लिए ₹9,000, मार्केटिंग, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए ₹4,500 और जैविक प्रमाणन तथा अवशेष जांच के लिए ₹3,000 दिए जाते हैं। योजना के नियमों के अनुसार, पात्र किसानों को अधिकतम 2 हेक्टेयर जमीन तक के लिए सहायता मिल सकती है। जैविक खेती के क्लस्टर बनाते समय छोटे और सीमांत किसानों को प्राथमिकता दी जाती है।

इस योजना के तहत जैविक उत्पादों का प्रमाणन करने में भारत की भागीदारी गारंटी प्रणाली (PGS-India) और जैविक उत्पादन के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम (NPOP) जैसी प्रणालियों की मदद ली जाती है। इन प्रमाणन प्रणालियों से किसानों के जैविक उत्पादों की पहचान और विश्वसनीयता बढ़ाने में मदद मिलती है, जिससे उन्हें सही बाजार तक पहुंचने का मौका मिलता है। किसानों को जैविक खेती के क्लस्टर और PGS-India के स्थानीय समूहों से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, ताकि वे मिलकर खेती के तरीकों, प्रमाणन और उपज की बिक्री से जुड़े काम कर सकें।

खेती से जुड़ी सलाह या योजना के बारे में जानकारी पाने के लिए किसान अपने नजदीकी कृषि विभाग के कार्यालय में संपर्क कर सकते हैं या किसान कॉल सेंटर के नंबर 1800-180-1551 पर फोन कर सकते हैं। जैविक प्रमाणन, किसान समूह का रजिस्ट्रेशन और योजना को लागू करने से जुड़ी जानकारी के लिए किसान अपनी संबंधित क्षेत्रीय परिषद (Regional Council) से भी संपर्क कर सकते हैं।

किसान खेती से जुड़ी दूसरी सरकारी योजनाओं के बारे में भी जानकारी ले सकते हैं। इसके लिए वे प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (PM-RKVY) के बारे में पढ़ सकते हैं, जिसके अंतर्गत PKVY को लागू किया जा रहा है। इसके अलावा, जैविक खाद के उत्पादन को बढ़ावा देने वाली राजस्थान गोवर्धन जैविक उर्वरक योजना के बारे में भी जानकारी ले सकते हैं।

योजना के लाभ

परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) जैविक खेती अपनाने के इच्छुक किसानों को आर्थिक और तकनीकी सहायता देती है। इससे खेती का खर्च कम करने, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और जैविक कृषि उत्पादों की बिक्री के बेहतर अवसर तैयार करने में मदद मिलती है। इस योजना के मुख्य लाभ इस प्रकार हैं:

  • किसानों को जैविक खेती से जुड़े कामों के लिए 3 साल तक प्रति हेक्टेयर ₹31,500 की आर्थिक सहायता दी जाती है।
  • कुल सहायता राशि में से प्रति हेक्टेयर ₹15,000 सीधे किसानों के बैंक खाते में DBT के माध्यम से भेजे जाते हैं। इस राशि का इस्तेमाल जैविक खाद, जैव उर्वरक और जैव कीटनाशक जैसी जैविक खेती की सामग्री खरीदने या तैयार करने के लिए किया जा सकता है।
  • किसानों को ट्रेनिंग और अपनी खेती से जुड़ी जानकारी व कौशल बढ़ाने के लिए सहायता दी जाती है। इससे वे जैविक खेती के तरीके सीख सकते हैं और प्राकृतिक खेती में इस्तेमाल होने वाली सामग्री तैयार करना भी सीख सकते हैं।
  • जैविक प्रमाणन और फसल में रासायनिक अवशेषों की जांच के लिए प्रति हेक्टेयर ₹3,000 की आर्थिक सहायता दी जाती है। इससे किसानों को अपनी उपज की गुणवत्ता साबित करने में मदद मिलती है।
  • किसानों को अपने जैविक कृषि उत्पादों की पैकेजिंग, ब्रांडिंग, मार्केटिंग और उनकी गुणवत्ता बढ़ाने के लिए सहायता दी जाती है।
  • यह योजना समूह बनाकर जैविक खेती को बढ़ावा देती है। इससे किसान आपस में संसाधन और जानकारी साझा कर सकते हैं तथा मिलकर जैविक खेती और प्रमाणन से जुड़े काम कर सकते हैं।
  • किसानों को PGS-India और NPOP जैसी मान्यता प्राप्त जैविक प्रमाणन प्रणालियों से जुड़ने का अवसर मिलता है। इससे उनके उत्पादों की पहचान और बाजार में स्वीकार्यता बढ़ाने में मदद मिलती है।
  • यह योजना स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जैविक सामग्री के इस्तेमाल को बढ़ावा देती है, जिससे किसानों को रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर अपनी निर्भरता कम करने में मदद मिलती है।
  • यह योजना मिट्टी की सेहत और उर्वरता सुधारने के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों का सही और लंबे समय तक इस्तेमाल करने को भी बढ़ावा देती है।
  • किसानों को जैविक बाजारों, प्रदर्शनियों, खरीदारों और विक्रेताओं की बैठकों, किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) और ऑनलाइन बिक्री प्लेटफॉर्म के माध्यम से खरीदारों से जुड़ने के अवसर मिलते हैं।
  • यह योजना किसान समूहों और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) के गठन को बढ़ावा देती है। इससे छोटे और सीमांत किसान मिलकर उत्पादन, प्रसंस्करण और अपने कृषि उत्पादों की बिक्री कर सकते हैं।
  • खेती में इस्तेमाल होने वाली सामग्री पर खर्च कम करने और प्रमाणित जैविक उत्पादों के लिए बाजार तक पहुंच बनाने से किसानों को अपनी आमदनी बढ़ाने के अवसर मिलते हैं।

योजना के तहत दी जाने वाली आर्थिक सहायता

पात्रताएं

परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) के तहत उन किसानों को सहायता दी जाती है जो समूह बनाकर जैविक खेती करना चाहते हैं। योजना के तहत आर्थिक सहायता पाने के लिए किसानों को किसी स्वीकृत जैविक खेती क्लस्टर में शामिल होना और योजना के लागू नियमों को पूरा करना जरूरी है। योजना की मुख्य पात्रता शर्तें इस प्रकार हैं:

  • जो किसान जैविक खेती अपनाना चाहते हैं, वे स्वीकृत क्लस्टर के माध्यम से इस योजना में शामिल हो सकते हैं।
  • योजना के नियमों के अनुसार, एक किसान को अधिकतम 2 हेक्टेयर जमीन तक के लिए आर्थिक सहायता मिल सकती है।
  • जैविक खेती के क्लस्टर बनाते समय छोटे और सीमांत किसानों को प्राथमिकता दी जाती है।
  • किसानों को ऐसे जैविक खेती क्लस्टर का हिस्सा बनना होगा, जिसमें आमतौर पर लगभग 20 हेक्टेयर कृषि भूमि शामिल होती है।
  • समूह के आधार पर जैविक प्रमाणन करवाने के लिए किसानों को PGS-India के स्थानीय समूह (Local Group) से जुड़ना होगा, जहां PGS-India प्रमाणन प्रणाली अपनाई जाती है।
  • किसानों को योजना के तहत तय जैविक खेती के तरीकों और प्रमाणन से जुड़े नियमों का पालन करना होगा।
  • योजना में शामिल होने वाले किसानों को जैविक खेती अपनाने और जांच, निगरानी तथा प्रमाणन के लिए जरूरी खेत से जुड़े रिकॉर्ड रखने के लिए तैयार रहना चाहिए।
  • जैविक खेती को बढ़ावा देने वाली संस्थाएं भी योजना के नियमों और संबंधित अधिकारियों की मंजूरी के अनुसार इसमें शामिल हो सकती हैं। हालांकि, किसी संस्था के शामिल होने का मतलब यह नहीं है कि उसे व्यक्तिगत किसान की तरह आर्थिक सहायता अपने आप मिल जाएगी।

आवश्यक दस्तावेज

परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) से जुड़ने के इच्छुक किसानों को अपने किसान समूह और क्षेत्रीय परिषद के माध्यम से रजिस्ट्रेशन और जैविक प्रमाणन से जुड़ी प्रक्रिया पूरी करनी होती है। PGS-India प्रणाली के तहत व्यक्तिगत किसान और समूह का रजिस्ट्रेशन करवाने के लिए आमतौर पर निम्नलिखित दस्तावेजों की जरूरत होती है:

  • आधार कार्ड या कोई अन्य मान्य पहचान पत्र।
  • रजिस्ट्रेशन और संपर्क के लिए मोबाइल नंबर।
  • जमीन के मालिकाना हक या जमीन से जुड़े दस्तावेज, जैसे खसरा, खतौनी, पट्टा या अन्य लागू भूमि रिकॉर्ड।
  • DBT के माध्यम से आर्थिक सहायता पाने के लिए बैंक खाते की जानकारी, जिसमें खाता नंबर और IFSC कोड शामिल हो।
  • हाल ही में खिंचवाई गई पासपोर्ट साइज फोटो।
  • किसान का भरा हुआ आवेदन फॉर्म।
  • फार्म हिस्ट्री शीट, जिसमें पहले की खेती के तरीकों और इस्तेमाल की गई कृषि सामग्री की जानकारी दी जाती है।
  • हस्ताक्षर किया हुआ PGS-India जैविक किसान शपथ पत्र, जिसमें किसान तय जैविक खेती के नियमों का पालन करने की सहमति देता है।
  • स्थानीय किसान समूह के रजिस्ट्रेशन का आवेदन और समूह में शामिल किसानों की सूची।
  • समूह के कामकाज से जुड़े हस्ताक्षर किए हुए समझौते और नियम एवं शर्तों का दस्तावेज ।
  • खेतों की जगह और उनके क्षेत्रफल की जानकारी देने वाला नक्शा, जहां इसकी जरूरत हो।

ध्यान दें: जरूरी दस्तावेजों की सही सूची राज्य सरकार और क्षेत्रीय परिषद के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। इसलिए रजिस्ट्रेशन करवाने से पहले किसान अपने संबंधित कृषि विभाग या क्षेत्रीय परिषद से जरूरी फॉर्म और दस्तावेजों की जानकारी जरूर ले लें। रजिस्ट्रेशन के लिए तय फॉर्म PGS-India पोर्टल पर उपलब्ध हैं।

आवेदन प्रक्रिया

परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) के तहत जैविक खेती शुरू करने के इच्छुक किसानों को किसी पात्र जैविक खेती क्लस्टर से जुड़ना होगा। इस योजना की प्रक्रिया राज्य के कृषि विभागों और क्षेत्रीय परिषदों के माध्यम से पूरी की जाती है। व्यक्तिगत किसानों के लिए पूरे देश में एक ही तरह का कोई राष्ट्रीय आवेदन फॉर्म नहीं है। योजना में शामिल होने के लिए नीचे दिए गए चरणों का पालन करें:

  • सबसे पहले अपने नजदीकी ब्लॉक या जिला कृषि कार्यालय, ATMA या कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) में जाएं। वहां पता करें कि आपके इलाके में PKVY के तहत जैविक खेती का कोई क्लस्टर उपलब्ध है या नहीं।
  • मौजूदा क्लस्टर से जुड़ें या दूसरे इच्छुक किसानों के साथ मिलकर नया क्लस्टर बनाने के बारे में जानकारी लें। आमतौर पर एक क्लस्टर में लगभग 20 हेक्टेयर कृषि भूमि शामिल होती है।
  • जरूरी दस्तावेज तैयार रखें। इनमें पहचान पत्र, जमीन से जुड़े दस्तावेज, बैंक खाते की जानकारी और लागू करने वाले अधिकारियों द्वारा मांगे गए अन्य दस्तावेज शामिल हो सकते हैं।
  • अपना आवेदन संबंधित कृषि विभाग या क्लस्टर स्तर पर योजना लागू करने वाली एजेंसी के पास जमा करें। अधिकारी आपको रजिस्ट्रेशन की पूरी प्रक्रिया के बारे में जानकारी देंगे।
  • संबंधित क्षेत्रीय परिषद पात्र किसानों के आवेदनों को इकट्ठा करके वार्षिक कार्य योजना तैयार करती है और मंजूरी के लिए इसे कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय को भेजती है।
  • मंजूरी मिलने और फंड जारी होने के बाद पात्र किसानों को योजना के नियमों के अनुसार आर्थिक सहायता दी जाती है। जैविक खेती में इस्तेमाल होने वाली सामग्री के लिए प्रति हेक्टेयर ₹15,000 की सहायता सीधे किसानों के बैंक खाते में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के माध्यम से भेजी जाती है।

किसान अपने जिले के कृषि कार्यालय में संपर्क करके यह पता कर सकते हैं कि उनके इलाके में PKVY के तहत जैविक खेती के क्लस्टर उपलब्ध हैं या नहीं। इसके साथ ही, वे अपने राज्य में आवेदन करने की प्रक्रिया के बारे में भी जानकारी ले सकते हैं।

योजना को लागू करने की प्रक्रिया

परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत जैविक प्रमाणन

जैविक प्रमाणन से किसानों को यह साबित करने में मदद मिलती है कि वे तय नियमों के अनुसार जैविक खेती कर रहे हैं और खेती में प्रतिबंधित रासायनिक खाद तथा कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। इससे खरीदारों को प्रमाणित जैविक उत्पादों की पहचान करने में आसानी होती है और किसानों के उत्पादों पर उनका भरोसा बढ़ता है।

परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) के तहत जैविक प्रमाणन मुख्य रूप से भारत की भागीदारी गारंटी प्रणाली (PGS-India) के माध्यम से किया जाता है। इसके अलावा, जैविक उत्पादन के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम (NPOP) भी एक मान्यता प्राप्त प्रमाणन प्रणाली है। इसका इस्तेमाल किसान और व्यवसाय खासकर बड़े बाजारों और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपने उत्पाद बेचने के लिए करते हैं।

1. भारत की भागीदारी गारंटी प्रणाली (PGS-India)

PGS-India जैविक प्रमाणन की एक आसान और कम खर्च वाली व्यवस्था है। इसे मुख्य रूप से छोटे और सीमांत किसानों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। इसका संचालन कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय जैविक एवं प्राकृतिक खेती केंद्र (NCONF) के माध्यम से किया जाता है। यह प्रणाली उन किसानों के लिए खासतौर पर उपयोगी है जो अपने जैविक उत्पाद घरेलू बाजार में बेचना चाहते हैं।

इस प्रणाली के तहत किसान कम से कम 5 सदस्यों का एक समूह बनाते हैं। समूह के किसान एक-दूसरे के खेतों में जाकर जांच करते हैं और देखते हैं कि खेती में कौन-से तरीके अपनाए जा रहे हैं। वे यह भी सुनिश्चित करते हैं कि समूह के सभी किसान जैविक खेती के तय नियमों का पालन कर रहे हैं। संबंधित क्षेत्रीय परिषद इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी करती है और प्रमाणन को मंजूरी देती है।

PGS-India प्रणाली के तहत प्रमाणन की दो तरह की स्थिति होती है:

  • PGS-Green: यह स्थिति उन किसानों को दी जाती है जिनके खेत जैविक खेती में बदलने की प्रक्रिया में होते हैं। ऐसे किसान जैविक खेती के जरूरी नियमों का पालन कर रहे होते हैं, लेकिन उन्होंने पूरी तरह जैविक प्रमाणन पाने के लिए जरूरी बदलाव की अवधि अभी पूरी नहीं की होती है।
  • PGS-Organic: यह प्रमाणन तब दिया जाता है जब किसान जरूरी बदलाव की अवधि पूरी कर लेते हैं और उनके खेत तय जैविक खेती के नियमों पर खरे उतरते हैं। इसके बाद किसान लागू नियमों के अनुसार अपनी उपज को PGS-प्रमाणित जैविक उत्पाद के रूप में बेच सकते हैं।

PGS-Green और PGS-Organic के बीच अंतर

जब किसान जैविक खेती शुरू करते हैं, तो उन्हें तुरंत पूरा जैविक प्रमाणन नहीं मिलता है। इसके लिए उनके खेतों को पहले एक बदलाव की अवधि से गुजरना पड़ता है। इस दौरान किसानों को जैविक खेती के जरूरी नियमों का पालन करना होता है। इन दोनों प्रमाणन स्थितियों के बीच मुख्य अंतर नीचे दिया गया है:

आधार

PGS-Green

PGS-Organic

मतलब
खेत में जैविक खेती अपनाने की प्रक्रिया चल रही है।खेत में बदलाव की जरूरी अवधि पूरी हो चुकी है और वह जैविक खेती के तय नियमों पर खरा उतरता है।
प्रमाणन की स्थिति
जैविक खेती में बदलाव की प्रक्रिया जारी है।पूरी तरह जैविक प्रमाणन मिल चुका है।
बदलाव की अवधि
अभी पूरी नहीं हुई है।जरूरी बदलाव की अवधि पूरी हो चुकी है।
उपज की बिक्री
उपज को पूरी तरह PGS-Organic प्रमाणित बताकर नहीं बेचा जा सकता है।लागू नियमों के अनुसार उपज को PGS-प्रमाणित जैविक उत्पाद के रूप में बेचा जा सकता है।

2. जैविक उत्पादन के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम (NPOP)

जैविक उत्पादन के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम (NPOP) भी जैविक प्रमाणन की एक मान्यता प्राप्त प्रणाली है। यह उन किसानों, प्रोसेसिंग करने वालों और व्यवसायों के लिए खासतौर पर उपयोगी है जो अपने उत्पाद बड़े बाजारों में, खासकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेचना चाहते हैं। इसका संचालन वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) द्वारा किया जाता है।

PGS-India प्रणाली में किसान एक-दूसरे के खेतों की जांच करते हैं, जबकि NPOP में मान्यता प्राप्त प्रमाणन एजेंसियों द्वारा स्वतंत्र रूप से खेतों और उत्पादन की जांच की जाती है। ये एजेंसियां देखती हैं कि किसान और व्यवसाय जैविक उत्पादन के तय नियमों का पालन कर रहे हैं या नहीं।

  • इस प्रणाली के तहत APEDA से मान्यता प्राप्त प्रमाणन एजेंसियों के माध्यम से प्रमाणन दिया जाता है।
  • खेती और उत्पादन के तरीकों की जांच करने के लिए स्वतंत्र निरीक्षण किया जाता है।
  • यह प्रमाणित जैविक कृषि उत्पादों की बिक्री और निर्यात को बढ़ावा देता है।
  • इससे किसानों, प्रोसेसिंग करने वालों और व्यवसायों को खरीदारों का भरोसा जीतने में मदद मिलती है।

PGS-India और NPOP प्रमाणन के बीच अंतर

दोनों प्रणालियां किसानों को जैविक प्रमाणन दिलाने में मदद करती हैं, लेकिन इनका तरीका अलग-अलग है और दोनों का इस्तेमाल अलग तरह के बाजारों के लिए किया जाता है। इनके बीच मुख्य अंतर नीचे दिया गया है:

आधार

PGS-India

NPOP

प्रमाणन का प्रकारसमुदाय और किसान समूह पर आधारित प्रमाणनतीसरे पक्ष द्वारा किया जाने वाला प्रमाणन
जांच का तरीकाकिसान एक-दूसरे के खेतों की जांच करते हैं।मान्यता प्राप्त एजेंसियां स्वतंत्र रूप से खेतों की जांच करती हैं।
संचालनकृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत NCONF के माध्यम सेवाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत APEDA के माध्यम से
किनके लिए उपयोगीछोटे और सीमांत किसानों के लिएकिसानों, प्रोसेसिंग करने वालों और निर्यातकों के लिए
बाजारमुख्य रूप से घरेलू बाजारघरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार

PGS-India के तहत पूरा जैविक प्रमाणन मिलने में कितना समय लगेगा, यह फसल के प्रकार और लागू प्रमाणन नियमों पर निर्भर करता है। इस दौरान किसानों को अपनी खेती से जुड़े रिकॉर्ड रखने होते हैं, समूह के दूसरे किसानों द्वारा की जाने वाली खेत की जांच में हिस्सा लेना होता है और अपनी क्षेत्रीय परिषद के निर्देशों का पालन करना होता है।

महत्वपूर्ण लिंक

संपर्क जानकारी

कृषि एवं किसान कल्याण विभाग, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार

  • फोन नंबर: 011-23385093 (विभाग का सामान्य संपर्क नंबर)
  • ईमेल: केंद्र सरकार की आधिकारिक डायरेक्टरी में PKVY के लिए कोई अलग ईमेल पता उपलब्ध नहीं मिला।
  • पता: कमरा नंबर 131, कृषि भवन, नई दिल्ली, भारत।

राष्ट्रीय जैविक एवं प्राकृतिक खेती केंद्र (NCONF)

PGS-India प्रमाणन और जैविक खेती से जुड़ी जानकारी पाने के लिए किसान राष्ट्रीय जैविक एवं प्राकृतिक खेती केंद्र (NCONF) से भी संपर्क कर सकते हैं।

परंपरागत कृषि विकास योजना में रजिस्ट्रेशन, क्लस्टर बनाने और जैविक प्रमाणन से जुड़ी सहायता के लिए किसान अपने राज्य के कृषि विभाग या संबंधित क्षेत्रीय परिषद से भी संपर्क कर सकते हैं। खेती से जुड़ी सामान्य जानकारी और सवालों के लिए किसान कॉल सेंटर के टोल-फ्री नंबर 1800-180-1551 पर फोन कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

परंपरागत कृषि विकास योजना भारत सरकार की एक योजना है, जिसकी शुरुआत वर्ष 2015-16 में हुई थी। इस योजना का उद्देश्य किसानों को समूह बनाकर जैविक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना और इसके लिए आर्थिक व तकनीकी सहायता देना है।
 

इस योजना की शुरुआत वर्ष 2015-16 में राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA) के तहत की गई थी। अक्टूबर 2024 में कृषि योजनाओं के पुनर्गठन के बाद इसे प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (PM-RKVY) के नौ घटकों में शामिल किया गया।
 

इस योजना के तहत पात्र किसानों को 3 साल में प्रति हेक्टेयर ₹31,500 की आर्थिक सहायता दी जाती है। इसमें से ₹15,000 जैविक खेती के लिए जरूरी सामग्री खरीदने या तैयार करने के लिए DBT के माध्यम से सीधे किसानों के बैंक खाते में भेजे जाते हैं।
 

जैविक खेती अपनाने के इच्छुक किसान इस योजना में शामिल हो सकते हैं। इसके लिए उन्हें स्वीकृत जैविक खेती क्लस्टर से जुड़ना और योजना की पात्रता शर्तों को पूरा करना जरूरी है। छोटे और सीमांत किसानों को प्राथमिकता दी जाती है।
 

योजना के लागू नियमों के अनुसार, एक पात्र किसान को अधिकतम 2 हेक्टेयर जमीन तक के लिए आर्थिक सहायता मिल सकती है।
 

किसान अपने नजदीकी ब्लॉक या जिला कृषि कार्यालय, ATMA या कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) में संपर्क कर सकते हैं। वहां से अपने क्षेत्र में उपलब्ध जैविक खेती क्लस्टर और आवेदन प्रक्रिया की जानकारी ले सकते हैं।
 

इस योजना के तहत आमतौर पर लगभग 20 हेक्टेयर कृषि भूमि को मिलाकर एक जैविक खेती क्लस्टर बनाया जाता है। इसमें कई किसान मिलकर जैविक खेती करते हैं।
 

PGS-India यानी भारत की भागीदारी गारंटी प्रणाली जैविक खेती के प्रमाणन की एक व्यवस्था है। इसमें किसान समूह बनाकर एक-दूसरे के खेतों की जांच करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि सभी किसान जैविक खेती के तय नियमों का पालन कर रहे हैं।
 

PGS-Green उन किसानों को दिया जाता है जिनके खेत जैविक खेती अपनाने की प्रक्रिया में होते हैं और जरूरी बदलाव की अवधि अभी पूरी नहीं हुई होती है। वहीं, PGS-Organic उन खेतों को दिया जाता है जिन्होंने जरूरी अवधि पूरी कर ली हो और जैविक खेती के तय नियमों को पूरा किया हो।
 

हां, योजना के तहत जैविक प्रमाणन और फसल में रासायनिक अवशेषों की जांच के लिए प्रति हेक्टेयर ₹3,000 की सहायता दी जाती है।
 

अगर योजनाओं के बारे में आपका कोई सवाल है, तो उसे योजना के फोरम में सबमिट करें और जवाब पाएँ:

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  • सवाल पूछें: अगर आपके मन में योजना से जुड़ा कोई सवाल है या आप इस विषय के किसी पहलू के बारे में और जानकारी चाहते हैं।
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